गाथा "गौरवशाली बिहार" की
ग्लोबल मीट की चर्चाएँ बिहार से जुड़ी प्राय: सभी इंटरनेट Communities पर आम थीं। काफी आशाएँ और उम्मीद की अटकलें लग रहीं थी। परिणाम भी स्वाभाविक ही था। माननीय राष्ट्रपति जी ने समय निकाल कर ग्लोबल मीट का शुभारंभ किया और इसे अपेक्षित सफलता मिली। इन सभी के अलावा जो एक और चीज उभर के आयी वो थी "गौरवशाली बिहार" पुस्तक का बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार द्वारा विमोचन।
इस पुस्तक के बारे में श्री नवीन जी ने पहले मुझसे इसकी चर्चा की थी और सच कहूँ तो मैंने उनके विचार को ज्यादा तूल ना देते हुए बस उनके हाँ में हाँ मिलायी थी। उस समय उनके मष्तिष्क में उपजे विचार के लिये उन्होंने जो मानदंड तय किये थे वो इतने ऊँचे थे कि मुझे उन विचारों का वास्तविकता में परिणत होना असंभव सा लगा। कुछेक मित्रों से मैंने इसकी चर्चा भी की पर फिर समय के साथ सब कुछ धुंधला सा हो गया।
चार-पाँच महीनों के बाद इस पुस्तक का विमोचन मेरे लिये एक आश्चर्य भरा सुखद अनुभव था। 1 Bihar के ब्लोग के माध्यम से कुछेक पंक्तियों को पढने का मौका मिला। फिर भी खुद को आश्वस्त नहीं कर पा रहा था। मुझे फिर नवीन जी की याद आयी और मैंने उनसे पुस्तक खरीदने के बारे में पूछा। उन्होंने मेरा स्थानीय पता माँगा और कहा कि वो पुस्तक को कोरियर के माध्यम से मुझे भेज देंगे। पुस्तक को लेकर कौतूहलता बढने लगी। मुझे चूँकि Office जाना था सो मैंने घर पर अपने एक संबंधी से कोरियर वाली बात कही और उन्हें अगले दिन घर से बाहर ना जाने को कहा ताकि कोरियर वाले के आने पर कोई जरूर उपलब्ध हो घर पे।
शाम में Office से लौटने पर मैंने अपने संबंधी से कोरियर के बारे में पूछा। निराशाजनक उत्तर मिला। मैंने नवीन जी से इस सिलसिले में कुछ भी पूछना उचित नहीं समझा। मैं अपनी उत्सुकता को किसी की लापरवाही नहीं कह सकता था। अगले दिन नवीन जी ने मुझे फोन कर बताया की कोरियर वाले ने 60/- रूपये की माँग की थी पुस्तक को स्थानांतरित करने के लिये। यह उन्हें मँहगा लगा और उन्होंने कहीं मिलकर पुस्तक देने की बात कही। फिर उन्होंने प्रस्ताव रखा कि वो आने वाले रविवार को बिहार भवन (बंगलौर) आ रहें हैं जो कि मेरे घर से कुछ ही दूरी पर है, जहाँ जाकर मैं उनसे अपने पुस्तक की प्रति प्राप्त कर लूँ। मुझे ये पसंद आया और खुशी हुयी कि इस बहाने श्री नवीन जी से मिलना भी हो जायेगा। अभी तक मेरी नवीन जी से जान पहचान सिर्फ फोन और ई-मेल तक ही सीमित थी।
रविवार के दिन नवीन जी ने पुनः मुझे उनके बिहार भवन आने की याद दिलायी और कहा कि वो मेरी प्रति साथ ला रहें हैं। पहुँचने के उपरांत उन्होंने फोन किया कि वो बिहार भवन पँहुच चुके हैं और नारंगी रंग की शर्ट पहने हुए हैं। मैं भी कुछ देर के बाद बिहार भवन पहुँचा जहाँ विहंगम योगा पे सभा का आयोजन किया गया था और काफी सारे योग मर्मी पहुँचे थे। मैं भी जाकर चुपचाप सभा में पालथी लगाकर बैठ गया और फिर एक SMS नवीन जी को प्रेषित किया कि मैं भी उन लोगों के बीच ही नीली रंग की टी-शर्ट में बैठा हूँ। और फिर इधर उधर नज़र दौड़ाने लगा की नवीन जी को मेरे होने का पता चल सके। तभी मेरी नज़र मेरे पीछे बैठे नवीन जी से मिली जिन्हें पहचानने में दिक्कत नहीं हुयी, क्योंकि उन्होंने अपने शर्ट के रंग के बारे में पहले ही बताया था।
एक सीधी-साधी काया जो कि नवीन जी के अंतर्मन को प्रतिबिंबित करती हुई सी प्रतीत हो रही थी। मिलने से पहले मेरे मन में उनको लेकर कई तरह के काल्पनिक चित्र उभर आये थे। Cisco Systems में Program Manager के रूप में कार्यरत, बंगलौर में पदस्थापित, मूलतः एक आई० आई० टी - बी० टेक० की दीक्षा प्राप्त व्यक्ति इतना सादगी पूर्ण होगा ये मेरे कल्पना से परे था। मोबाइल और इ-मेल के माध्यम से संपर्क होने के कारण उनके उच्च विचारों से बहुत कुछ अवगत था। हम लोग विहंगम योगा वाले सभा भवन से बाहर आये और नीचे हाल मैं बैठ गये। नवीन जी ने अपने बैग से पुस्तक की एक प्रति मुझे निकाल कर दी। पुस्तक की कीमत को पुस्तक के प्रति मेरे आदर स्वरूप मैंने नवीन जी को सुपुर्द किया। मेरे पास अब वो पुस्तक थी जिसके लिये मैंने काफी इंतजार किया था। पुस्तक को लेकर मैंने उस पर विहंगम दृष्टि डाली। पुस्तक का आवरण काफी आकर्षक बना है जिसमें प्रतिनिधिस्वरूप बिहार के ऎतिहासिक व्यक्तियों के चित्रों को स्थान दिया गया है। अंदर के पृष्ठ और टाइपसेटिंग मनमोहक लगी। आलेखों की सूची पर ध्यान देने पर पता चला कि इस पुस्तक को मूर्त रूप प्रदान करने में 23 ऎसे व्यक्तियों का योगदान है जो अपने अपने क्षेत्र में काफी सफल हैं और आलेखों की प्रामाणिकता को पुख्ता करते हैं। आगे के पृष्ठ पर 1 Bihar टीम के सदस्यों के नाम थे जो किसी ना किसी व्यवसायिक प्रतिष्ठान में ऊँचा ओहदा रखते हैं और अगर मेरी नज़र को स्थान दे तो मैं ये जरूर कहना चाहूँगा कि ऊँचे ओहदे पर रहने वालों के लिये समय निकालना काफी कठिन होता है। खासकर निजी क्षेत्र में काम करने वालों के लिये तो यह बात सौ प्रतिशत सत्य है।
बातों ही बातों में मैंने नवीन जी के समक्ष यह प्रश्न रखा कि कैसे वे अपना काम करते हुए इन सब चीजों के लिये समय निकाल पाते हैं। मुझे उनका जो जवाब मिला वो काफी साधारण पर वजन लिये हुए था। उन्होनें बताया कि जीवन से उन्होने जो अपेक्षायें थी वो उन्हें प्राप्य हैं और अब जो उद्देश्य है वो है अपने समाज के लिये समय निकालना। और अगर उद्देश्य साफ हो तो एक जोश पैदा होता है जो समय निकालता है। उन्होंने Dry Fun और Wet Fun का ज़िक्र किया, जिसमें उन्होने उदाहरण देते हुए समझाया कि हम सभी आजकल जो पार्टियाँ और होटलबाजी में जो भी खर्च करतें हैं वो यह सोचकर कि वो खुशियाँ देगीं पर पार्टियाँ खत्म होते ही हम महसूस करतें हैं की वे एक बहाना भर था पर असली खुशी नहीं। इसे उन्होंने Dry Fun की संज्ञा दी। फिर बताया कि उसी पार्टी को घर में दोस्तों के साथ हँसते बोलते खुद खाना बनाते हुए मनाया जाये तो वो खुशी देर तक टिकेगी। इसे उन्होंने Wet Fun बताया। और भी काफी सारी बातें हुयी। मेरी शादी करने के बात पर उन्होने सलाह दी कि मुझे निजी जिदगी और व्यवसायिक जिंदगी को मिश्रित ना करते हुए अब विवाह कर लेना चाहिये। हर समय का अंत होता है, अच्छा हो या बुरा। मेरा भी नवीन जी से विदा लेने का वक्त आ गया और मैंने उनसे जाने की अनुमति ली।
घर आकर पुस्तक को गर्व से अपने दोस्तों के बीच रखा। प्राय: सभी ने आशचर्य व्यक्त किया कि ऎसी पुस्तक बिहार के बारे में भी प्रकाशित हो सकतीं हैं। मेरी रूचि इतिहास में रहने के बावजूद भी कुछ नाम एसे थे जिनके बारे में मैंने पहली बार सुना था। मेरे एक दोस्त ने मुझसे प्रश्न किया कि क्या इसमें भारत के सभी महापुरुषों के बारे में लिखा है। मेरा सहज उत्तर था...नहीं इसमें सिर्फ बिहारियों के बारे में ही छपा है। पहली बार बिहारी शब्द सम्मान का सूचक प्रतीत हो रहा था। इसके बाद मैं कुछ देर तक पुस्तक से ऎसे चिपका रहा कि मुझे ये होश ही ना रहा कि और भी बहुत सारे काम हैं करने को और रविवार के बाद का दिन Office जाने का है।
पुस्तक के आलेख के बारे में अगले ब्लोग में लिखने की अनुमति चाहूँगा। उससे पहले एक बात जरूर बताना चाहूँगा कि इस पुस्तक ने मेरे मन में अधिपत्य की भावना को जन्म दिया और मैंने इस पुस्तक के आलेख सूची वाले पृष्ठ पर अपना नाम लिखकर इस भाव को प्रकाशित किया। नमन उन महानुभावों को जिनके प्रयासों से ये सब कुछ संभव हुआ।
इस पुस्तक के बारे में श्री नवीन जी ने पहले मुझसे इसकी चर्चा की थी और सच कहूँ तो मैंने उनके विचार को ज्यादा तूल ना देते हुए बस उनके हाँ में हाँ मिलायी थी। उस समय उनके मष्तिष्क में उपजे विचार के लिये उन्होंने जो मानदंड तय किये थे वो इतने ऊँचे थे कि मुझे उन विचारों का वास्तविकता में परिणत होना असंभव सा लगा। कुछेक मित्रों से मैंने इसकी चर्चा भी की पर फिर समय के साथ सब कुछ धुंधला सा हो गया।
चार-पाँच महीनों के बाद इस पुस्तक का विमोचन मेरे लिये एक आश्चर्य भरा सुखद अनुभव था। 1 Bihar के ब्लोग के माध्यम से कुछेक पंक्तियों को पढने का मौका मिला। फिर भी खुद को आश्वस्त नहीं कर पा रहा था। मुझे फिर नवीन जी की याद आयी और मैंने उनसे पुस्तक खरीदने के बारे में पूछा। उन्होंने मेरा स्थानीय पता माँगा और कहा कि वो पुस्तक को कोरियर के माध्यम से मुझे भेज देंगे। पुस्तक को लेकर कौतूहलता बढने लगी। मुझे चूँकि Office जाना था सो मैंने घर पर अपने एक संबंधी से कोरियर वाली बात कही और उन्हें अगले दिन घर से बाहर ना जाने को कहा ताकि कोरियर वाले के आने पर कोई जरूर उपलब्ध हो घर पे।
शाम में Office से लौटने पर मैंने अपने संबंधी से कोरियर के बारे में पूछा। निराशाजनक उत्तर मिला। मैंने नवीन जी से इस सिलसिले में कुछ भी पूछना उचित नहीं समझा। मैं अपनी उत्सुकता को किसी की लापरवाही नहीं कह सकता था। अगले दिन नवीन जी ने मुझे फोन कर बताया की कोरियर वाले ने 60/- रूपये की माँग की थी पुस्तक को स्थानांतरित करने के लिये। यह उन्हें मँहगा लगा और उन्होंने कहीं मिलकर पुस्तक देने की बात कही। फिर उन्होंने प्रस्ताव रखा कि वो आने वाले रविवार को बिहार भवन (बंगलौर) आ रहें हैं जो कि मेरे घर से कुछ ही दूरी पर है, जहाँ जाकर मैं उनसे अपने पुस्तक की प्रति प्राप्त कर लूँ। मुझे ये पसंद आया और खुशी हुयी कि इस बहाने श्री नवीन जी से मिलना भी हो जायेगा। अभी तक मेरी नवीन जी से जान पहचान सिर्फ फोन और ई-मेल तक ही सीमित थी।
रविवार के दिन नवीन जी ने पुनः मुझे उनके बिहार भवन आने की याद दिलायी और कहा कि वो मेरी प्रति साथ ला रहें हैं। पहुँचने के उपरांत उन्होंने फोन किया कि वो बिहार भवन पँहुच चुके हैं और नारंगी रंग की शर्ट पहने हुए हैं। मैं भी कुछ देर के बाद बिहार भवन पहुँचा जहाँ विहंगम योगा पे सभा का आयोजन किया गया था और काफी सारे योग मर्मी पहुँचे थे। मैं भी जाकर चुपचाप सभा में पालथी लगाकर बैठ गया और फिर एक SMS नवीन जी को प्रेषित किया कि मैं भी उन लोगों के बीच ही नीली रंग की टी-शर्ट में बैठा हूँ। और फिर इधर उधर नज़र दौड़ाने लगा की नवीन जी को मेरे होने का पता चल सके। तभी मेरी नज़र मेरे पीछे बैठे नवीन जी से मिली जिन्हें पहचानने में दिक्कत नहीं हुयी, क्योंकि उन्होंने अपने शर्ट के रंग के बारे में पहले ही बताया था।
एक सीधी-साधी काया जो कि नवीन जी के अंतर्मन को प्रतिबिंबित करती हुई सी प्रतीत हो रही थी। मिलने से पहले मेरे मन में उनको लेकर कई तरह के काल्पनिक चित्र उभर आये थे। Cisco Systems में Program Manager के रूप में कार्यरत, बंगलौर में पदस्थापित, मूलतः एक आई० आई० टी - बी० टेक० की दीक्षा प्राप्त व्यक्ति इतना सादगी पूर्ण होगा ये मेरे कल्पना से परे था। मोबाइल और इ-मेल के माध्यम से संपर्क होने के कारण उनके उच्च विचारों से बहुत कुछ अवगत था। हम लोग विहंगम योगा वाले सभा भवन से बाहर आये और नीचे हाल मैं बैठ गये। नवीन जी ने अपने बैग से पुस्तक की एक प्रति मुझे निकाल कर दी। पुस्तक की कीमत को पुस्तक के प्रति मेरे आदर स्वरूप मैंने नवीन जी को सुपुर्द किया। मेरे पास अब वो पुस्तक थी जिसके लिये मैंने काफी इंतजार किया था। पुस्तक को लेकर मैंने उस पर विहंगम दृष्टि डाली। पुस्तक का आवरण काफी आकर्षक बना है जिसमें प्रतिनिधिस्वरूप बिहार के ऎतिहासिक व्यक्तियों के चित्रों को स्थान दिया गया है। अंदर के पृष्ठ और टाइपसेटिंग मनमोहक लगी। आलेखों की सूची पर ध्यान देने पर पता चला कि इस पुस्तक को मूर्त रूप प्रदान करने में 23 ऎसे व्यक्तियों का योगदान है जो अपने अपने क्षेत्र में काफी सफल हैं और आलेखों की प्रामाणिकता को पुख्ता करते हैं। आगे के पृष्ठ पर 1 Bihar टीम के सदस्यों के नाम थे जो किसी ना किसी व्यवसायिक प्रतिष्ठान में ऊँचा ओहदा रखते हैं और अगर मेरी नज़र को स्थान दे तो मैं ये जरूर कहना चाहूँगा कि ऊँचे ओहदे पर रहने वालों के लिये समय निकालना काफी कठिन होता है। खासकर निजी क्षेत्र में काम करने वालों के लिये तो यह बात सौ प्रतिशत सत्य है।
बातों ही बातों में मैंने नवीन जी के समक्ष यह प्रश्न रखा कि कैसे वे अपना काम करते हुए इन सब चीजों के लिये समय निकाल पाते हैं। मुझे उनका जो जवाब मिला वो काफी साधारण पर वजन लिये हुए था। उन्होनें बताया कि जीवन से उन्होने जो अपेक्षायें थी वो उन्हें प्राप्य हैं और अब जो उद्देश्य है वो है अपने समाज के लिये समय निकालना। और अगर उद्देश्य साफ हो तो एक जोश पैदा होता है जो समय निकालता है। उन्होंने Dry Fun और Wet Fun का ज़िक्र किया, जिसमें उन्होने उदाहरण देते हुए समझाया कि हम सभी आजकल जो पार्टियाँ और होटलबाजी में जो भी खर्च करतें हैं वो यह सोचकर कि वो खुशियाँ देगीं पर पार्टियाँ खत्म होते ही हम महसूस करतें हैं की वे एक बहाना भर था पर असली खुशी नहीं। इसे उन्होंने Dry Fun की संज्ञा दी। फिर बताया कि उसी पार्टी को घर में दोस्तों के साथ हँसते बोलते खुद खाना बनाते हुए मनाया जाये तो वो खुशी देर तक टिकेगी। इसे उन्होंने Wet Fun बताया। और भी काफी सारी बातें हुयी। मेरी शादी करने के बात पर उन्होने सलाह दी कि मुझे निजी जिदगी और व्यवसायिक जिंदगी को मिश्रित ना करते हुए अब विवाह कर लेना चाहिये। हर समय का अंत होता है, अच्छा हो या बुरा। मेरा भी नवीन जी से विदा लेने का वक्त आ गया और मैंने उनसे जाने की अनुमति ली।
घर आकर पुस्तक को गर्व से अपने दोस्तों के बीच रखा। प्राय: सभी ने आशचर्य व्यक्त किया कि ऎसी पुस्तक बिहार के बारे में भी प्रकाशित हो सकतीं हैं। मेरी रूचि इतिहास में रहने के बावजूद भी कुछ नाम एसे थे जिनके बारे में मैंने पहली बार सुना था। मेरे एक दोस्त ने मुझसे प्रश्न किया कि क्या इसमें भारत के सभी महापुरुषों के बारे में लिखा है। मेरा सहज उत्तर था...नहीं इसमें सिर्फ बिहारियों के बारे में ही छपा है। पहली बार बिहारी शब्द सम्मान का सूचक प्रतीत हो रहा था। इसके बाद मैं कुछ देर तक पुस्तक से ऎसे चिपका रहा कि मुझे ये होश ही ना रहा कि और भी बहुत सारे काम हैं करने को और रविवार के बाद का दिन Office जाने का है।
पुस्तक के आलेख के बारे में अगले ब्लोग में लिखने की अनुमति चाहूँगा। उससे पहले एक बात जरूर बताना चाहूँगा कि इस पुस्तक ने मेरे मन में अधिपत्य की भावना को जन्म दिया और मैंने इस पुस्तक के आलेख सूची वाले पृष्ठ पर अपना नाम लिखकर इस भाव को प्रकाशित किया। नमन उन महानुभावों को जिनके प्रयासों से ये सब कुछ संभव हुआ।
Labels: Bihar, Gauravshali Bihar, Legends of Bihar, Naveen, One Bihar Team

5 Comments:
At 11:04 PM,
Ajit Chouhan said…
Good start,really enjoyed your post.
At 12:21 AM,
Rajeev Ranjan Lal said…
Thanks, though it was not the real feedback but a detail of getting a copy of the long desired book. I am in the process of enjoying the book without keeping any eye for critics. So it will take time to give real feedback.
At 4:01 AM,
Samir Kumar Mishra said…
Good going Rajeev. Keep it up. Very well expressed.
At 4:32 PM,
Chandan said…
Rajiv Ji...bahaut hi sundar lekh likha hai aapnae.Naveen Ji ne aapko dry fun & wet fun ke bare me jo bataya..ushi drishtikone se..aapka ye lekh hamarae liye 'wet compliment' hi hai. Vykigatal star pe, aapa ye lekh mujhe bahaut dino tak khushi dega aur hamare atmavishwa ko badhaiga :)
राम-राम,
चंदन
At 12:26 PM,
Abhishek Mishra said…
"तड़प रहे हैं कोटी-कोटी ग्राम देवता
अक्षत और जल के बिना ही नग्न मूर्छित हो,
सूखी आंत, मींचे दांत, पथ्राये हुए नैन
टकटकी लगाए हैं, पाटने कि ओर, दिल्ली कि ओर ।"
-- अमोघ
-- तार स्वर शीर्षक से (मैं तो तेरे पास में)
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